निरंजन ने इस उपन्यास में विचार-निरपेक्ष, अंधाधुंध विकास की चपेट में आए सामाजिक सम्बन्धों और साझा राष्ट्रीय स्वप्न के क्रमिक विखंडन को अभावुक ढंग से दर्ज करने का प्रयास किया है। इस स्वप्न के प्रतीक ‘नेताजी’ का ब्रेन हेमरेज की चपेट में आ जाना एक तरह से पूरे समाज की असाध्य मानसिक व्याधि का रूपक है। लेकिन, नेताजी या कोई और व्यक्ति नहीं उपन्यास का केंद्रीय चरित्र बाजार ही है।