यह, वह देश तो नहीं, मॉरीशस : एक सामाजिक यात्रा, हिंदी के चर्चित लेखक देवेंद्र चौबे के यात्रा-वृत्तांत की एक अनूठी किताब है। संस्मरण और यात्रा-वृत्तांत जैसी लेखन-विधाओं से जिस प्रकार दूसरे समाजों की सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक, भाषिक आदि विशेषताओं का उल्लेख किया जाता है; ठीक उसी तरह, डायरी, यात्रा-वृत्तांत लेखन किसी समाज के इन्हीं तत्वों को दर्ज करने में सहायक विधा हो सकती है, इसका प्रमाण यह पुस्तक है। आज़ादी के बाद, पारंपरिक सभ्यता, अलग-अलग संस्कृतियों और विचार-धाराओं का प्रभाव, औद्योगिक विकास, आधुनिकीकरण की प्रक्रिया, राजनीति और राजनीतिक व्यवस्थाओं में बदलाव, भूमंडलीकरण से उत्पन्न जीवनशैली के बदलाव, समाज पर पड़ने वाले आर्थिक दबाव, सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास, लोक साहित्य और संस्कृति से नयी पीढ़ी का जुड़ाव, स्त्री-पुरुष के आपसी संबंध के यथार्थ की चुनौतियाँ और समभाव के कारण द्वीप-भूमि की ज़िंदगी ने मॉरीशियस जन-जीवन की पद्धति और चिंतनधारा को किस प्रकार गहरे प्रभावित किया है, इसका जायज़ा देवेंद्र चौबे न केवल वहाँ के लेखन को पढ़कर लेते हैं, बल्कि वहाँ के शहरी और गाँवों की सामाजिक यात्रा करते हुए निम्न तबके के लोगों, किसान, मज़दूर, लोक गायकों, समाज वैज्ञानिकों एवं धार्मिक तथा सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के साथ ही, अप्रवासी गुलामों और भारतीय गिरमिटिया मज़दूरों के मुक्ति संघर्ष से संबंधित अविस्मरणीय तारीख़ों और जगहों को दर्ज करते चलते हैं।
डायरी, यात्रा-वृत्तांत शैली में लिखित इस किताब में लेखक ने इस बात की तरफ़ संकेत किया है कि मॉरीशस की आज़ादी से पहले ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों के ख़िलाफ़ अप्रवासी मज़दूरों ने जो मुहिम छेड़ी थी, उसे मॉरीशस पर लिखने वाले अधिकांश लेखकों ने नगण्य मान वहाँ के धार्मिक और सांस्कृतिक आंदोलनों की भूमिका पर अधिक ज़ोर दिया। देवेंद्र चौबे का मानना है कि मॉरीशस को बिना सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों के नहीं समझा जा सकता है जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण बात है।